Putrastee Viedhan (2 Vols) |Mridula Trvedi|PB|Mlbd Publications
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संतान जो स्वयं का ही रूपांतरित एवं परिमार्जित स्वरूप है, वह सृष्टि के सृजन का शाश्वत सत्य एवं परिवार की निरन्तरता का सुरभित, सुगन्धित, सुन्दर सेतु है, जो प्रभु की सत्ता और क्षमता को सम्यक् स्वरूप में समझने हेतु सशक्त संज्ञान और प्रमाण है। संतति सुख की समृद्धि से सन्दर्भित समस्त शास्त्रीये ग्रन्थों के स्वर्णिम सिद्धान्त सूत्रों को चार सौ से भी अधिक जन्मांगों पर सत्यापित करने के उपरान्त, प्रभु के पदपंकज का परम पावन पंचामृत 'पुत्रेष्टि विधान' शीर्षांकित शोध संरचना में प्रवाहित हुआ है, जो नौ पृथक् पृथक् अध्यायों में व्याख्यायित है - (1) संतति स्वरूप, (2) संतति सुख हेतु प्रयत्न एवं प्रतीक्षा, (3) पंचम भावस्थ ग्रह एवं विभिन्न राशियाँ, (4) संतति और समय की सत्ता, (5) संतान जन्म समय विचार, (6) संततिहीनता का संत्रास, (7) संततिहीनता का विकल्प-दत्तक संतान, (8) ऋतुकाल एवं गर्भकाल तथा (9) बालारिष्ट योग । यह पुस्तक ज्योतिष शास्त्र के समस्त शास्त्रीय ग्रन्थों के मूलभूत संस्कृत श्लोकों के आधुनिक परिवेश में विविध प्रमाणों और व्यावहारिक जन्मांगों के अध्ययन पर आधारित है जिसमें पुत्र सुख अथवा पुत्री जन्म से संबंधित समस्त जिज्ञासा और आकांक्षा की आतुर आकुलता से संबंधित विविध सिद्धान्त सूत्र, लगभग एक हजार पृष्ठों में समायोजित है। यह प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रों एवं श्रद्धालु आराधकों व पुत्र अथवा संततिहीनता से व्याकुल दम्पतियों के लिए पठनीय, अनुकरणीय और संग्रहणीय है।








